Poet & a Writer
Samvedna is an Indian poet and writer whose literary work is shaped by close observation, memory, and social consciousness. She began writing poetry at a young age and has since developed a sustained and recognisable voice that moves between the personal and the political, engaging with contemporary realities through language and lived experience.
Her poems have been published in several leading Hindi literary journals, and she has presented poetry readings and participated in literary platforms and gatherings across India. Her writing reflects long-term engagement with modern Hindi literature and evolving cultural discourse.
Alongside poetry, Samvedna writes literary essays and critical pieces and has worked extensively as a Hindi–English journalist and editor, contributing feature articles and editorial work for magazines. Her broader body of work explores themes of society, gender, environment, and storytelling, situating literature as both creative expression and social reflection.


Awards & Books


Samvedna is the recipient of the Shyama Salil Award (1999) and the Vageeshwari Award of Madhya Pradesh, India, for her first poetry collection, Ladkiyaan Jo Pul Hoti Hain (2008) (लड़कियाँ जो पुल होती हैं). The book is widely recognised for its restrained language, emotional depth and socially attentive perspective.
Her poem, "Global Warming" was published, along with its English translation, in Climate Justice in india (Cambridge University Press), edited by environmental scholar Prakash Keshwan. This publication reflects her engagement with environmental themes and the intersection of literature, ethics, and contemporary global concerns.
Few Poems by Samvedna
थोड़े -थोड़े हम पूरे -पूरे तुम
बहुत से शोरग़ुल की
बहुत सी आवाज़ें
चीखें -पुकारें
टकराहटें
उम्मीदें
अचानक जब हो जाती हैं
मौन
तो सुनाई देने लगती है
एक चुप आवाज़
जैसे स्थिर पानी
उसमें रुका हुआ
कोई प्रतिबिम्ब
चुपचाप खड़ा घूरता दरख़्त
छनती सी
हलकी पीली - धूप
ज़मीन पर पड़े चुपचाप
थोड़े भारी से होते नम पत्ते
छिपता - छिपाता सा
निकलता इंद्रधनुष
बहता सा आसमान
कुछ नीला
पर ज़्यादा सुफैद
दो छोटे ताज़े खिले
लाल फूलों पर पड़ी
सुनहरी ओस की बूँदें
कत्थई हवा
गहराती और गहराती
फिर अचानक
इसमें से निकल आते
दो तांबई चेहरे
दो आकृतियाँ
आसमान के कोने से
एक छोटा सुराख़ बनाकर
हाथ पकड़े
निकलने लगतीं
आसमान से परे ...........
गुनगुनाती
दो मद्धम मद्धम आवाज़ें
थोड़े - थोड़े हम
पूरे - पूरे तुम
थोड़े - थोड़े हम
पूरे - पूरे तुम ........
⁃ संवेदना , २०२३
बिटिया का ब्लैकबोर्ड
कभी अजीबो-ग़रीब मिलाईं तुकें
तो कभी बटोरे चिकने चिकने पत्थर
कुछ गणित सीखी तो कभी घंटों दोस्तों के साथ मिलकर
पीसा फूलों-पत्तियों का रंग
और भर लिया उन्हें अपनी कांच की छोटी - छोटी
शीशियों में
जैसे मेरा तुम्हारा हम सबका रंगीन सच्चा - झूठा सा
पर सचमुच का बचपन
कभी वैजंतीमाला या वहीदा रहमान की तरह
नृत्य कर सकने के लिए
न जाने किये
कितने कितने जतन
पहले -पहल बहन के साथ पकाये
वो अधपके - जले हुए चावल
पहले बचपन फिर धीरे - धीरे
बढ़ते हुए
बड़े होने तक
ज़िन्दगी को समझने - सीखने के
किये कितने रियाज़!
कैसे अनमोल से पलों में डूबे
प्रयास कुछ अभ्यास !
फिर भी जब जब खोली
अपने जीवन की नोटबुक
तो उसके बीचोंबीच कुछ वर्क़ थे
अब भी जिनमें लिखे थे
खोखले से बदरंग कुछ सवाल
ये सवाल
जवाबों के न मिल पाने के लिए ही थे अभिशप्त
और मेरी नोटबुक को पूरा पूरा भर पाने के लिए
अक्षर - अक्षर
चहक रहे थे
बस यूँ ही बस ऐसे ही बहक रहे थे
बिलकुल ऐसा ही कोई सवाल
जैसे कि मैंने क्यूँ उड़ा दी थी उस दिन
उस शैतान लड़के के पेंसिल-बॉक्स में से
वो पंख - फड़फड़ाती बेचैन सी तितली
और फिर दांत निपोरते उस लड़के से डर भी गयी थी
क्यूँ नहीं चढ़ पाई कभी भी बेफ़िक़्र
उस टेसू के पेड़ पर
क्यूँ नहीं मारा उस आदमी को एक ज़रूरी तमाचा
गहराइयों को बचाते बचाते ख़ुद ही क्यूँ और कब
कैसे डूबना सीख गई
बहुत डर जाती हूँ जब कभी देखती हूँ
अपनी बिटिया को चुपचाप कुछ लिखते हुए
उसकी सीक्रेट डायरी में
कैसे बताऊँ उसे
कि मैंने उसे लिखना सीखने से बहुत पहले ही क्यूँ
लाकर दिया वो ब्लैकबोर्ड
पूरे आत्मविश्वास से जब उसने बनाई थी वो पहली मछली
ब्लैकबोर्ड पर
तो मुझे लगा था
जैसे खुले आसमान के नीचे पानी पर
तैर रही हो कोई बत्तख़
उसका वो पहला आत्मविश्वास से भरा
लिखा गया पहला शब्द
जिसका मतलब सिर्फ़ वो ही जानती थी
मेरे लिए था मेरे अपने शब्द-ब्रह्म से
मेरा पहला साक्षात्कार
जीवन की स्वरलहरियों के बीच
अब जब मैंने नाचना - गाना सीख ही लिया है
तब भी हौले से चुपचाप देख आती हूँ
बिटिया का ब्लैकबोर्ड
उसके पास
नयी रंग बिरंगी चॉक रख आती हूँ
सोचती हुई सो जाती हूँ कि जल्द ही लाऊँगी
उसके लिए एक नया
और और बड़ा ब्लैकबोर्ड
- संवेदना -
११ अक्टूबर ' २०१६
मुंबई
~ विस्मृति ~
एक के पीछे एक
रेंगतीं चींटियों की क़तार सी
सिर्फ़ महसूस किए गए
स्पर्श से संतुष्ट
हमारे मौन के लिए कृतघ्न
हमारी अनकही बातों
हमारी भूली हुई चीज़ों
हमारे हौले से चुपचाप देखे गये
स्वप्नों को बचाती हुई
धुंधली होती जाती स्मृतियाँ
विस्मृति की ओट में जा बैठती हैं
-संवेदना’२०२५
मुंबई
सिंडरेला की परी
माँ तुम्हारी चूड़ियाँ
तुम्हारी ही साड़ी
तुम्हारी ही वो मोटी-सी पायलें पहनना बचपन से ही
कितना-कितना अच्छा लगता था
पर अब जब तुम्हारा कंगन
अपने हाथों में देखती हूँ माँ
तो मुझे मुझमें तुम ही नज़र आती हो
थम सा जाता है
मेरा हर दुःख
मेरा हर सुख
और सपनों के रंगों को गहरा जाता है
मेरे सपनों के आकाश में आख़िर
तुम कब रहने आ गईं?
क्या तुम सचमुच सिंडरेला की परी बन गईं
और चूमकर जाने लगीं चुपचाप
हर रात मेरा माथा?
तभी रोज़ सुबह कुछ नम सी होती है
मेरी आँखों और माथे के बीच वाली वो जगह
मेरे बालों को सहलाकर तुम हर रात
चली जाती हो
अब तो कुछ अजब ही बिखरे-बिखरे से होते हैं
रोज़ सुबह मेरे बाल
और इसीलिए तुम्हें किसी रात
चोरी से पकड़ना चाहती हूँ मैं
एक साल बीत सा गया
बचपन का मेरा
पौ फटते ही उठकर
चिड़ियाँ देखने का शौक़ भी कुछ कम सा क्यों पड़ गया!?
अब बेचैन सी रातों को जागने लगी हूँ मैं
अजीब-ओ-ग़रीब सपने भी देखने लगी हूँ
तुम्हारी ही तरह कांच की चूड़ियां पहनने का मेरा शौक़
अब और बढ़ गया
मैं अब पहले से ज़्यादा बालों में फूल लगाती हूँ
बड़ी सी बिंदी लगाना और कभी-कभी ख़ुशबूदार पान खाना चाहती हूँ
माँ अब मैं तुम्हें याद करना नहीं चाहती
मैं तुम ही हो जाना चाहती हूँ
तुम ये सब देख रही हो
छिप कर दूर खड़ी सिंडरेला की परी बन कर
वरना इतनी जल्द
कैसे बदल जाती
मेरे सपनों की बग्घी और हवा से बातें करने लगती
मेरी घड़ी में अभी बारह नहीं बजे हैं माँ
और किसी प्रिंस चार्मिंग के इंतज़ार वाली उम्र भी
मेरी कब की बीत चुकी
लेकिन तुम कितने प्यार से
कोई न कोई ख़्वाब रोज़
आँखों में फूँक जाती हो
अब भी सपने देखने का हौसला दे जाती हो
तुम अब सिर्फ़ यादों में ही कहाँ रहती हो?
हाँ माँ! सच है कि अब तुम!
मुझमें ही मुझको दिखती चली जाती हो
लेकिन !
पूरी कविता लिखने के बाद
आख़ीर में झूठ बोलूँ भी तो कैसे बोलूँ माँ
बिना यादों के कितना भी तलाशूँ चाहे
मैं अपने में तुम्हारा अक्स
पर फिर भी
तुम माँ हो ना
और माँ तुम सचमुच
हर पल
बहुत-बहुत याद आती हो !
- संवेदना -
१५ जुलाई २०१६
मुंबई
